मंदिर जी का परिचय
1008 श्री चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन मन्दिर कुआँवाला, रेवाड़ी शहर का लगभग 200 वर्ष प्राचीन मन्दिर है। इस मन्दिर की स्थापना फाल्गुन सुदी 5, विक्रम संवत् 1883 (सन् 1827) में की गई थी। मंदिर जी में अत्यन्त अतिशयकारी एवं मनोहारी प्रतिमाएँ स्थापित हैं। इस मन्दिर के मूलनायक 1008 श्री चन्द्रप्रभ भगवान हैं। मन्दिर जी के मुख्य द्वार के सामने 65-70 फुट गहरा एक प्राचीन कुआँ स्थित है। इसी कारण मंदिर जी को 1008 श्री चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन मन्दिर कुआँ वाला के नाम से जाना जाता है। पूर्व में यह मन्दिर गर्भगृह तक ही सीमित था। कालान्तर में विकास होते हुए इस मन्दिर का धीरे-धीरे विस्तार होते हुए आज विशाल रूप हो गया हैं। 1008 श्री चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन मन्दिर की दीवारों, वेदियो एवं गुम्बज पर प्राचीन नक्काशी स्वर्ण से की गई है जो इस मन्दिर की शिल्प एवं स्वर्णकला का बेहतरीन नमूना प्रदर्शित करती है एवं यहाँ आने वाले दर्शनार्थियों एवं श्रावकों के मन को मोह लेती है। मंदिर जी के प्रांगण में आचार्य शान्तिसागर सदन है, जिसमें एक सभागार एवं साधुओं के चातुर्मास हेतु ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। मंदिर जी के प्रांगण में ही श्री दिगम्बर जैन धर्मार्थ औषधालय है, जिसमें रोगियों की आयुर्वेदिक पद्धति से चिकित्सा की जाती है।
मंदिर जी में कुल पाँच वेदिया स्थापित हैं। मूलनायक वेदी में श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान जी की विक्रम सम्वत-1921, वर्ष-1864, माह-ज्येष्ठ शुक्ला-5 की प्रतिमा के साथ अन्य जैन प्रतिमाएँ विराजमान है। मंदिर जी की दूसरी वेदी में श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान जी की 15वीं शताब्दी की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर जी की तीसरी वेदी बाहुबली भगवान जी की है। मंदिर जी की चौथी वेदी भी श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान जी की है। मंदिर जी की पाँचवी वेदी में मूलनायक प्रतिमा श्री 1008 आदिनाथ भगवान जी की है। सभी वेदियो में अन्य पाषाण एवं अष्ट धातु से निर्मित प्रतिमाएँ विराजमान है, जो इस प्रकार है -
मूल वेदी श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान जी
श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत -1921, वर्ष -1864, माह - ज्येष्ठ शुक्ला -5 (मूलनायक)
वेदिनायक श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान जी
- श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, 15वीं सदी (मूलनायक)
- श्री 1008 महावीर भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1854, वर्ष-1828, माह-फाल्गुन शुक्ला-12
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1861, वर्ष-1804, माह-बैशाख शुक्ला-9
- श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1923, वर्ष-1866, माह-ज्येष्ठ शुक्ला-10
- श्री 1008 पार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-2035, वर्ष-1979, माह-चैत्र शुक्ला-14
- श्री 1008 आदिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1935, वर्ष-1879, माह-माघ शुक्ला-3
- श्री 1008 महावीर भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2534, वर्ष-2008, माह-वैशाख कृष्णा-10
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2534, वर्ष -2008, माह-वैशाख कृष्णा-10
- श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2534, वर्ष-2008, माह-वैशाख कृष्णा-10
- श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2534, वर्ष-2008, माह-वैशाख कृष्णा-10
- श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2534, वर्ष -2008, माह-वैशाख कृष्णा-10
- श्री 1008 नेमिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1062, वर्ष-1005
वेदीनायक श्री बाहुबली भगवान जी
मंदिर जी में प्रथम तल पर पौष सुदी 14, वीर निर्वाण संवत-2526 (21 जनवरी, सन् 2000) को आचार्य 108 श्री विद्यानन्द जी महाराज के परम शिष्य 108 श्री श्रुतसागर जी महाराज के सान्निध्य में एक 7 फुट ऊँची अत्यन्त मनोहारी भगवान बाहुबली जी की खड़गासन प्रतिमा विराजमान की गई है, जो भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। (मूलनायक) श्री बाहुबली प्रतिमा जी, ऊँचाई -सात फुट (खड्गासन), वीर सम्वत-2526, वर्ष-2000, माह - पौष शुक्ला -14
वेदिनायक श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान जी
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1980, वर्ष -1924, माह-फाल्गुन शुक्ला-2 (मूलनायक)
- श्री 1008 आदिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1980, वर्ष-1924, माह-फाल्गुन शुक्ला-2
- श्री 1008 महावीर भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-2000, वर्ष-1943, माह-वैशाख शुक्ला-15
- श्री 1008 आदिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1963, वर्ष-1906, माह-वैशाख शुक्ला-13
- श्री 1008 आदिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1963, वर्ष-1906, माह-वैशाख शुक्ला-13
- श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1980, वर्ष-1924, माह-फाल्गुन शुक्ला-2
- श्री 1008 पार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1980, वर्ष-1924, माह-फाल्गुन शुक्ला-2
- श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2526, वर्ष-2000, माह-पौष शुक्ला-14
- श्री 1008 महावीर भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2530, वर्ष-2004, माह-फाल्गुन शुक्ला-12
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1891, वर्ष-1834, माह-वैशाख शुक्ला
- श्री 1008 आदिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1863, वर्ष-1806, माह-वैशाख शुक्ला-13
- श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1963, वर्ष-1906, माह-वैशाख शुक्ला-13
- श्री 1008 आदिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1826, वर्ष-1769, माह-वैशाख शुक्ला-6
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1683, वर्ष-1627, माह-माघ शुक्ला-5
- श्री 1008 पार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2534, वर्ष-2008, माह-वैशाख कृष्णा-10
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2543, वर्ष-2017, माह-वैशाख कृष्णा-1
- श्री 1008 महावीर भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2543, वर्ष-2017, माह-वैशाख कृष्णा-1
वेदिनायक श्री 1008 आदिनाथ भगवान जी
- श्री 1008 आदिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1909, वर्ष-1852, माह-वैशाख शुक्ला-12 (मूलनायक)
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1548, वर्ष-1491, माह-वैशाख शुक्ला-3
- श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-548, वर्ष-1491, माह-वैशाख शुक्ला-3
- श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1548, वर्ष-1491, माह-वैशाख शुक्ला-3
- श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान प्रतिमा जी, वीर सम्वत-2534, वर्ष-2008, माह-वैशाख कृष्णा-10
- श्री 1008 नेमिनाथ भगवान प्रतिमा जी, विक्रम सम्वत-1923, वर्ष-1866, माह-ज्येष्ठ शुक्ला-10
- पंचमेरु, विक्रम सम्वत-1934, वर्ष-1878, माह-फाल्गुन शुक्ला-10
- चतुर्मुखी प्रतिमा, विक्रम सम्वत-1935, वर्ष-1879, माह-माघ शुक्ला-3
एक बार का वाक्य
एक बार श्री राजेन्द्र कीर्ति भट्टारक जी (जती जी) का जैन समाज के कुछ श्रावाकों से मतभेद हो गया था, इस कारण कुछ श्रावकों ने समाज के सहयोग से 1008 श्री चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन मन्दिर कुआँ वाला का निर्माण करने का निर्णय लिया। जती जी बड़े ही चमत्कारी बाबा थे। उन्होंने कहाँ कि जो व्यक्ति कुआँ वाला मन्दिर में मेरी अनुमति एवं सलाह के बिना गलत मुहूर्त में प्रतिमा स्थापित करेगा तो निश्चित ही उसकी मृत्यु हो जाएगी और यदि कोई भी व्यक्ति शास्त्र स्वाध्याय, धर्म चर्चा आदि गद्दी पर बैठकर करेगा तो उसकी भी मृत्यु हो जाएगी। जती जी का यह कथन सत्य निकला, प्रतिमा स्थापित करने वाले एवं अनुचित तरीके से शास्त्र स्वाध्याय करने वाले दोनों व्यक्ति जिद्दी प्रवृत्ति के थे, उन्होंने जती जी की बात नहीं मानी और दोनों का निधन हो गया।
मन्दिर जी का अतिशय
जैन समाज के श्री नानक चन्द जी जैन पंसारी ने बताया कि पूर्व समय में मन्दिर जी के व्यास को मन्दिर से मधुर संगीत की आवाज सुनाई देती थी, इस बात की प्रामाणिकता को जानने के लिये कुछ व्यक्ति मन्दिर जी में छिप कर बैठ गये। उनको आवाज सुनाई दी कि मंदिर जी में आज के बाद इस तरह से नहीं बैठना। इससे यह ज्ञात होता है कि रात्रि में निश्चित ही देवगण भगवान की संगीतमय भक्ति करते हैं और देवों को अपनी भक्ति में विघ्न-बाधा पसन्द नहीं है। एक बार मन्दिर जी के व्यास को सन् 2016 में प्रातः 4:00 बजे मन्दिर खोलने पर पीताम्बर वस्त्र पहने हुए, अत्यन्त चमचमाते आभूषणों से युक्त दो इन्द्र मूलनायक 1008 श्री चन्द्रप्रभु भगवान का अभिषेक करते हुए दिखाई दिये। जैसे ही देवों ने व्यास को देखा वे तुरन्त अदृश्य हो गये और यह सब देखकर व्यास आश्चर्यचकित रह गए।
जैन समाज एवं सुविधाए
धर्मनगरी रेवाड़ी पर भगवान महावीर स्वामी एवं दिगम्बर संतो का आशीर्वाद एवं बुजुर्गों की विशेष कृपा रही है। जिसके फलस्वरूप यहाँ पर छह जैन मंदिर, सात जैन विद्यालय और लगभग दस अन्य जन उपयोगी संस्थाएँ कार्यरत है। रेवाड़ी में लगभग 200 जैन परिवारों का समाज है। जैन समाज द्वारा मंदिर जी का संचालन सुचारु रूप से होता है। जैन मंदिरों में दूर के क्षेत्रों से दर्शन करने आए यात्रियों के लिए रुकने की व्यवस्था भी उपलब्ध करवाई जाती है। सम्पर्क करके आने पर भोजन की व्यवस्था भी उपलब्ध करवाई जाती है। क्षेत्र में जैन साधु महाराज जी के आगमन पर त्यागी भवन में रुकने की व्यवस्था की जाती है।
क्षेत्र के बारे में
रेवाड़ी भारत के हरियाणा राज्य में स्थित है। यह शहर भारतीय राजमार्ग (NH-71B) के आसपास स्थित है और रेवाड़ी जिला का मुख्यालय भी है। रेवाड़ी क्षेत्र का इतिहास बहुत प्राचीन है और इसके आसपास कई प्राचीन स्मारक और ऐतिहासिक स्थल हैं। रेवाड़ी अपने आप में बहु आयामी प्रतिभाओ, महान कलाकारों, कवियों, साहित्यकारों, शूरवीरो, धार्मिक स्थलों, शैक्षणिक प्रतिष्ठानों, प्रकृतिं सौंदर्य से ओतप्रोत दक्षिणी हरियाणा का एक ऐसा स्थान है, जहाँ आकर मन को सुकून और पवित्रता का बोध होता है। प्राचीन महाभारत काल के दौरान, रेवत नामक एक राजा था, जिसकी पुत्री का नाम रेवती था। उसे सब रेवा कहकर बुलाते थे और उसके नाम पर शहर 'रेवा वाडी' की स्थापना की थी। खाने के हिसाब से यहाँ की रेवड़ियाँ बहुत मशहूर हैं। यहाँ पर भारत की सबसे पहली गौशाला सन् 1878 में बनाई गई थी जो कि राजा राव युधिष्ठिर यादव द्वारा बनाई गई थी। रेवाड़ी क्षेत्र ने आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यह शहर एक आधुनिक बाजार सेंटर भी है जो निकटवर्ती गांवों और नगरों को आवश्यक सामग्री और सेवाओं की पहुंच प्रदान करता है। इसके अलावा रेवाड़ी क्षेत्र के पास कई प्राकृतिक सौंदर्य स्थल भी हैं जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। सम्पूर्ण रूप से रेवाड़ी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण और विकासशील क्षेत्र है, जो सांस्कृतिक, आर्थिक, और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
समिति
मंदिर जी के सुचारु रूप से संचालन के लिए मंदिर समिति का निर्माण किया गया है। समिति में कार्यरत सदस्य इस प्रकार है -
प्रधान - श्री पदम कुमार जैन
सचिव - श्री रमेश जैन
कोषाध्यक्ष - श्री सुनील कुमार जैन
सदस्य - श्री अजित प्रसाद जैन पंसारी




















